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गणेश जी को दूर्वा अत्याधिक प्रिय क्यों है इसके संबंध में पुराणों में एक कथा कही गई है जिसके अनुसार अनादि काल में अनलासुर नाम का एक विशाल दैत्य हुआ करता था जिसके कोप से धरती सहित स्वर्ग लोक में भी त्राही-त्राही मची हुई थे।

मोदक और लड्डू का भोग तो भगवान गणेश जी को अति प्रिय है ही इसके अलावा गणेश जी को ‘दूर्वा’ चढ़ाने का भी काफी महत्व है। कहा जाता है कि गणेश पूजन में गणेश जी को दूर्वा अर्पित करने से गणेश जी प्रसन्न होते हैं और भक्त को उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है।

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आपको बता दें कि ‘दूर्वा’ एक प्रकार की घास है जिसे ‘दूब’ भी कहा जाता है, संस्कृत में इसे दूर्वा, अमृता, अनंता, गौरी, महौषधि, शतपर्वा, भार्गवी आदि नामों से जाना जाता है। ‘दूर्वा’ कई महत्वपूर्ण औषधीय गुणों से युक्त है। इसका वैज्ञानिक नाम साइनोडान डेक्टीलान है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय जब समुद्र से अमृत-कलश निकला तो देवताओं से इसे पाने के लिए दैत्यों ने खूब छीना-झपटी की जिससे अमृत की कुछ बूंदे पृथ्वी पर भी गिर गईं थी जिससे ही इस विशेष घास ‘दूर्वा’ की उत्पत्ति हुई। 

गणेश जी को दूर्वा अत्याधिक प्रिय क्यों है इसके संबंध में पुराणों में एक कथा कही गई है जिसके अनुसार अनादि काल में अनलासुर नाम का एक विशाल दैत्य हुआ करता था जिसके कोप से धरती सहित स्वर्ग लोक में भी त्राही-त्राही मची हुई थे। समस्त देवता, ऋषि-मुनि, मानव इस दैत्य के आतंक से त्रस्त थे। यह दैत्य धरती पर मानवों को जिंदा ही निगल जाता था। 

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इस विशालकाय दैत्य से तंग आकर एक बार देवराज इंद्र सहित समस्त देवता और ऋषि-मुनि महादेव शिवजी की शरण में पहुंचे और प्रार्थना की कि हमें इस दैत्य के आतंक से मुक्ति दिलाएं। महादेव ने कहा कि यह काम तो विध्नहर्ता गणेश ही कर सकते हैं, आपको उनकी शरण में जाना चाहिए। महादेव का आदेश पाकर सभी देवता और प्रमुख ऋषि-मुनि भगवान गणेश जी के पास पहुंचे और अनलासुर के कोप से मुक्ति दिलाने की विनती गणपति बप्पा से की। 

देवताओं, ऋषि-मुनियों और धरती पर प्राणियों के संकट निवारण के लिए गणेश जी ने अनलासुर के साथ युद्ध करने का निश्चय किया। महा दैत्य अनलासुर से भयंकर युद्ध करते हुए गणेश जी ने अनलासुर को उसके किए की सजा कुछ ऐसे दी कि उसको ही निगल लिया। गणेश जी के पेट में जाने के बाद इस दैत्य के मुंह से तीव्र अग्नि निकली जिससे गणेश के पेट में बहुत जलन होने लगी। गणपति के पेट की जलन शांत करने के लिए कश्यप ऋषि ने गणेश जी को दूर्वा की 21 गांठें बनाकर खाने के लिए दी। ‘दूर्वा’ को खाते ही गणेश जी के पेट की जलन शांत हो गई और गणेश जी प्रसन्न हुए जिसके बाद सभी देवताओं, ऋषि-मुनियों सहित समस्त धरती वासियों ने गणेश की खूब जय-जयकार की। कहा जाता है तभी से भगवान गणेश को दूर्वा चढ़ाने की परंपरा प्रारंभ हुई। 

गणेश पूजन में ‘इदं दुर्वादलं ऊं गं गणपतये नमः’ मंत्र बोलकर गणेश जी को दूर्वा अर्पित करें। 

अमृता गोस्वामी

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